यह कविता हर उस शख्स की है जो अभी-अभी ज़िन्दगी के तौर-तरीके सिख रहा है और अपने पैरो पर खड़ा होने का प्रयास कर रहा है| उस रस्ते पर कितनी कठिनाइयों का सामना करते हुए आगे बढ़ता है, कितना कुछ सीखता है| आइये इस कविता के ज़रिये जानते है |
अभी तो बस चला हूँ मै, बिन अकड के ही खड़ा हूँ मै ||
गिरावटो को चीरकर,
मुकद्दरो से छीनकर,
बिन आग ही जला हूँ मैं |
अभी तो बस चला हूँ मैं,
बिन अकड के ही खड़ा हूँ मैं ||
क़र्ज़ का बोझ लादकर,
मेरी गलतियों को यादकर,
कुछ पल ही तो थमा हूँ मैं |
अभी तो बस चला हूँ मैं,
बिन अकड के ही खड़ा हूँ मैं ||
मेरे अपनों की बात से,
कभी अपनी ही औकात से,
कदम-कदम डरा हूँ मैं |
अभी तो बस चला हूँ मैं,
बिन अकड के ही खड़ा हूँ मैं ||
समाज के विधान से,
कभी अपने ही अभिमान से,
बेख़ौफ़ ही लड़ा हूँ मैं |
अभी तो बस चला हूँ मैं,
बिन अकड के ही खड़ा हूँ मैं ||
मंजिल तो अभी दूर है,
मेरी ख्वाइशे मजबूर है,
मंज़रो पर कहा रुका हूँ मै,
अभी कहा थमा हूँ मैं |
अभी तो बस चला हूँ मैं,
बिन अकड के ही खड़ा हूँ मैं ||
इस दुनिया की रीत को,
मेरे अपनों के प्रीत को,
इस ज़िन्दगी के गीत को,
दिल खोलकर रटा हूँ मैं |
अभी तो बस चला हूँ मैं,
बिन अकड के ही खड़ा हूँ मैं ||
सूर्य के प्रताप सा,
कभी अग्नि के ताप सा,
इन हवाओ में बहा हूँ मैं,
हरी-भरी धरा हूँ मैं |
अभी तो बस चला हूँ मैं,
बिन अकड के ही खड़ा हूँ मैं ||


-वैभव गणेश बुंदेले


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